यह काफी दुखद है कि आज देश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट बताती है कि छह वर्ष से 14 वर्ष तक की शिक्षा का हाल देश में चिंताजनक है। सर्वे के मुताबिक, कक्षा आठ में पढ़ने वाले 25 फीसदी बच्चे कक्षा दो की टेक्स्ट बुक को पढ़ने में आज असमर्थ हैं। 2०14 के आखिर तक कक्षा पांच में पढ़ने वाले केवल 48.1 फीसदी बच्चे ही क्लास दो की टेक्स्ट पुस्तक को पढ़ पाने में समर्थ हुए। यह अपने आप में बताने के लिए काफी है कि देश में शिक्षा व्यवस्था का क्या हाल है। केंद्र सरकार को चाहिए कि अविलंब इस पर गौर करे। बच्चे इस देश के भविष्य हैं, अगर बुनियाद ही खराब होगी तो हमारे देश का भविष्य कभी उज्जवल नहीं हो सकता। केवल बातों से अच्छे दिन नहीं आएंगे, अच्छे दिन लाने के लिए धरातल पर काम करने चाहिए।
Wednesday, 14 January 2015
केंद्र सरकार पहले इस देश की शिक्षा व्यवस्था को सुधारे
यह काफी दुखद है कि आज देश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट बताती है कि छह वर्ष से 14 वर्ष तक की शिक्षा का हाल देश में चिंताजनक है। सर्वे के मुताबिक, कक्षा आठ में पढ़ने वाले 25 फीसदी बच्चे कक्षा दो की टेक्स्ट बुक को पढ़ने में आज असमर्थ हैं। 2०14 के आखिर तक कक्षा पांच में पढ़ने वाले केवल 48.1 फीसदी बच्चे ही क्लास दो की टेक्स्ट पुस्तक को पढ़ पाने में समर्थ हुए। यह अपने आप में बताने के लिए काफी है कि देश में शिक्षा व्यवस्था का क्या हाल है। केंद्र सरकार को चाहिए कि अविलंब इस पर गौर करे। बच्चे इस देश के भविष्य हैं, अगर बुनियाद ही खराब होगी तो हमारे देश का भविष्य कभी उज्जवल नहीं हो सकता। केवल बातों से अच्छे दिन नहीं आएंगे, अच्छे दिन लाने के लिए धरातल पर काम करने चाहिए।
Tuesday, 13 January 2015
Monday, 12 January 2015
Saturday, 10 January 2015
जनता पर महंगाई की मार: अब टीवी, फ्रिज और ए.सी आदि महंगे हुए
आज देश में कंपनियां मनमानी पर उतारू हैं। इसी मनमानी का नतीजा है कि कई कंज्यूमर ड्यूरेबल्स कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स के दाम 5 फीसदी तक बढ़ा दिए हैं। अब टीवी, फ्रिज या फिर ए.सी खरीदने से पहले जनता को सोचना पड़ेगा। यह सरासर गलत और निंदनीय है। इन कंपनियों ने एक्साइज ड्यूटी और उत्पादन लागत में बढ़ोतरी का जो हवाला देते हुए कीमतों में वृद्धि की है, उस पर सरकार को पहल करनी चाहिए। एक्साइज ड्यूटी और उत्पादन लागत में बढ़ोतरी का बोझ उपभोगताओं पर क्यों पड़े? इस बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण था कि सरकार ने एक्साइज ड्यूटी पर मिल रही छूट को आगे बढ़ाने से इनकार किया, जिसके बाद कंपनियों ने ऐसा फैसला लिया है। कमज़ोर रुपए का होना भी इसका बड़ा कारण है। लेकिन मेरा एक ही मानना है कि किसी भी सूरत में जनता पर कोई बोझ नहीं पड़ना चाहिए। सरकार को चाहिए कि अविलंब इस पर पहल करे और ऐसी मनमानी पर अंकुश लगाए।
मुझे एक और बात भी पता लगी है कि जैसे कोई उपभोगता एक नया मोबाइल फ़ोन इंस्ट्रूमेंट खरीदता है 13,000 रूपए में उसी इंस्ट्रूमेंट को वही कंपनी एक दिन के बाद 7,000 या 8,000 रूपए में बेचती है। मेरा मानना है कि फ़ास्ट कंज्यूमर गुड्स के ऊपर भी सरकार का नियंत्रण होना चाहिए जिससे कि उपभोगता खुद को लुटा हुआ महसूस न करें और ये सुनिश्चित किया जाये कि उनके साथ कभी भी गुड्स और प्रोडक्ट्स के मामले में किसी प्रकार की धांधली नहीं हो। इसी प्रकार मैं ये भी मानता हूँ कि देश में युवाओं को इन्टरनेट की सुविधा उचित दरों पर मिलनी चाहिए क्योंकि आज देश के युवा इन्टरनेट पर काफी निर्भर हैं.
Friday, 9 January 2015
केंद्र की योजना जनता पर पड़ सकती है भारी
मुझे इस बात का डर है कि केंद्र की योजना कहीं जनता पर भारी न पड़ जाए। उद्योग संघ पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एवं उद्योग और क्रिसिल रेटिग ने एक शोध-पत्र जारी किया है। कहा गया है कि 'मेक इन इंडिया' परियोजना को बढ़ावा देने और 7-8 फीसदी विकास दर हासिल करने के लिए आने वाले पांच सालों के दौरान भारत को अपनी सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में 26 हजार अरब रुपये की आवश्यकता होगी।
यह इसलिए है क्योंकि आज भी देश की गरीब जनता अपनी मूलभूत समस्याओं से जूझ रही है। गांवों के इस देश में गरीब जनता के लिए सबसे पहले भोजन, वस्त्र और आवास की व्यवस्था की जानी चाहिए। यहां देश परेशानियों से जूझ रहा है और इस सरकार के नुमाइंदे हजारों-अरबों रुपए को शहरीकरण जैसी योजनाओं पर खर्च करने की बात कर रहे हैं, यह ठीक नहीं है। शहरीकरण भी जरूरी है, वो तब है जब देश की आम जनता को मुलभुत सुविधाएं मुहय्या हों। सरकार जिस भी योजना को लाए, लेकिन जनता पर इसका बोझ कतई नहीं पड़ना चाहिए।
यह इसलिए है क्योंकि आज भी देश की गरीब जनता अपनी मूलभूत समस्याओं से जूझ रही है। गांवों के इस देश में गरीब जनता के लिए सबसे पहले भोजन, वस्त्र और आवास की व्यवस्था की जानी चाहिए। यहां देश परेशानियों से जूझ रहा है और इस सरकार के नुमाइंदे हजारों-अरबों रुपए को शहरीकरण जैसी योजनाओं पर खर्च करने की बात कर रहे हैं, यह ठीक नहीं है। शहरीकरण भी जरूरी है, वो तब है जब देश की आम जनता को मुलभुत सुविधाएं मुहय्या हों। सरकार जिस भी योजना को लाए, लेकिन जनता पर इसका बोझ कतई नहीं पड़ना चाहिए।
बेरोजगारी दर बढ़कर 4.9 प्रतिशत
युवाओं की हमें अब इस बात को लेकर गहरी चिंता हो रही है कि हमारे युवा साथियों को रोज़गार का अवसर नहीं मिल पा रहा है। 2०14 लोकसभा चुनाव के दौरान इसी भाजपा ने 2 करोड़ हाथो को रोजगार देने का वादा किया था, लेकिन आज इसी भाजपा सरकार ने स्वीकार कर लिया है कि देश में बेरोज़गारी दर बढ़ गई है। श्रम मंत्रालय ने भारत में बेरोजगारी की दर का अध्ययन किया है। मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष में बेरोजगारी की दर बढ़कर 4.9 प्रतिशत पहुंच गई है। श्रम मंत्रालय की इकाई श्रम ब्यूरो द्वारा जारी ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते वित्त वर्ष में अखिल भारतीय स्तर पर बेरोज़गारी की दर बढ़कर 4.9 प्रतिशत पर पहुंच गयी है जो 2०12-13 में 4.7 प्रतिशत थी। पुरुषों में बेरोजगारी की दर 2०13-14 में बढ़कर 4.1 प्रतिशत पहुंच गयी जो 2०12-13 में 4 प्रतिशत थी। वहीं महिलाओं में बेरोजगारी की दर बढकर 7.7 प्रतिशत पहुंच गयी जो 2०12-13 में 7.2 प्रतिशत थी।
ये आंकड़े अपने आप में बताने के लिए काफी है कि भाजपा ने चुनाव के दरम्यान जितने वादे किए थे, उसे पूरा कर पाने में यह सरकार पूरी तरह से विफल रही है।
Thursday, 8 January 2015
जमीनी हकीकत से नावाकिफ है सरकार
देश में `मेक इन इंडिया' कैसे होगा साकार, जब सरकार को जमीनी स्तर का पता ही नहीं है? केवल बातों में `मेक इन इंडिया’ का गीत गाने से क्या होगा। क्या सरकार ने कभी यह जानने की कोशिश की कि मैनुफैक्चरिग सेक्टर्स की हालत आज क्या हो गई है। विश्व की थर्ड लारजेस्ट पीसी मेकर कंपनी 'डेल’ देश में मैनुफैक्टरिग क्षमता को लेकर संघर्ष के दौर से गुजर रही है। यही नहीं, 'एसर’ भी व्यापार का अनुकूल माहौल न होने की वजह से आज देश में इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ड्स का विस्तार करने से हिचक रही है। केवल यही नहीं हैं। देश में ऐसी हज़ारों कंपनियां हैं जो आज आखिरी सांस गिन रही हैं। `मेक इन इंडिया' का केवल प्रचार करने से पहले सरकार को इन पर भी तो सोचना चाहिए था। यह भी हकीकत है कि खराब नीतियों के कारण जीडीपी का वो ग्रोथ नहीं हो रहा है, जो सरकार ने वादे किए थे। पिछले वर्ष सरकार के चार माह पूरा करने के बावजूद फैक्ट्री का उत्पादन .1 फीसदी रहा, जो पहले 3.5 फीसदी हुआ करता था।
भारत में मैनुफैक्चरिग की राह में सबसे बड़ी समस्या है- बिजली की किल्लत और इसकी अधिक कीमत का होना। इसके आर्थिक मामलों में जहां अन्य देशों में 2-4 फीसदी ब्याज है, वहीं हमारे देश में यह 15 फीसदी है। इन परेशानियों के कारण भारत में मैनुफैक्चरिग 2० फीसदी हमेशा से कम होता रहा है। सरकार को चाहिए कि इस पर ध्यान दें और `मेक इन इंडिया' का ढोल पीटने से पहले यहां की समस्याओं पर गौर करें।
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