Thursday, 8 January 2015

जमीनी हकीकत से नावाकिफ है सरकार

देश में `मेक इन इंडिया' कैसे होगा साकार, जब सरकार को जमीनी स्तर का पता ही नहीं है? केवल बातों में `मेक इन इंडिया’ का गीत गाने से क्या होगा। क्या सरकार ने कभी यह जानने की कोशिश की कि मैनुफैक्चरिग सेक्टर्स की हालत आज क्या हो गई है। विश्व की थर्ड लारजेस्ट पीसी मेकर कंपनी 'डेल’ देश में मैनुफैक्टरिग क्षमता को लेकर संघर्ष के दौर से गुजर रही है। यही नहीं, 'एसर’ भी व्यापार का अनुकूल माहौल न होने की वजह से आज देश में इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ड्स का विस्तार करने से हिचक रही है। केवल यही नहीं हैं। देश में ऐसी हज़ारों कंपनियां हैं जो आज आखिरी सांस गिन रही हैं। `मेक इन इंडिया' का केवल प्रचार करने से पहले सरकार को इन पर भी तो सोचना चाहिए था। यह भी हकीकत है कि खराब नीतियों के कारण जीडीपी का वो ग्रोथ नहीं हो रहा है, जो सरकार ने वादे किए थे। पिछले वर्ष सरकार के चार माह पूरा करने के बावजूद फैक्ट्री का उत्पादन .1 फीसदी रहा, जो पहले 3.5 फीसदी हुआ करता था।
भारत में मैनुफैक्चरिग की राह में सबसे बड़ी समस्या है- बिजली की किल्लत और इसकी अधिक कीमत का होना। इसके आर्थिक मामलों में जहां अन्य देशों में 2-4 फीसदी ब्याज है, वहीं हमारे देश में यह 15 फीसदी है। इन परेशानियों के कारण भारत में मैनुफैक्चरिग 2० फीसदी हमेशा से कम होता रहा है। सरकार को चाहिए कि इस पर ध्यान दें और `मेक इन इंडिया' का ढोल पीटने से पहले यहां की समस्याओं पर गौर करें।
 

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