Thursday, 8 January 2015
Wednesday, 7 January 2015
सरकार का रवैया प्रजातंत्र के लिए घातक
आज (7 जनवरी 2०15) मैंने अपने आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया, उस कॉन्फ्रेंस में मैंने सरकार के रवैये पर अपनी राय व्यक्त की।
मुझे इस बात से काफी अफ़सोस है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश जिस पर हम सभी को गर्व है, उस लोकतंत्र पर आघात करने के लिए ये सरकार आमादा है. जब से यह सरकार सत्ता में आई है, ऐसा लगता है कि वो यही सोचकर सत्ता में आई थी की इन्हें विपक्षी दलों के विचारों को दरकिनार करते हुए एक दलीय सरकार को ही चलाना है. सरकार ने संसद की संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए अध्यादेश को पारित करने की राह को चुना है. हमें आज भी याद है, यू पी ए के शासनकाल में यही भाजपा थी जो ये बार बार कहती थी की इमरजेंसी के वक़्त ही देशहित में अध्यादेश पारित होना चाहिए. वहीँ आज के हालात पर गौर करें तो यही भाजपा अपने वक्तात्यों से पलटते हुए संसद के आखिरी सत्र के एक दिन बाद ही अध्यादेश को जारी किया और संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया. अगर सही से याद करें तो ऐसा संसद के इतिहास में कभी नहीं हुआ था कि सत्र के स्थगित होने के बाद अध्यादेशों की एक कड़ी पारित हुई हो. हमने ऐसा इमरजेंसी के दौरान ही देखा था जब लगातार अध्यादेश जारी किये गए थे. कोई भी यह समझ सकता है कि संसद सत्र जब ना चल रहा हो, उस वक़्त अध्यादेश समझ में तो आता है, लेकिन अगर चुनी हुई सरकार लगातार अध्यादेश जारी करने की राह अपनाये तो यह प्रजातंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है. यह इस बात को दर्शाता है की सरकार इतने गंभीर कानूनों पर बहस कर पाने में असमर्थ थी. एक सरकार के दृष्टिकोण से यह सही नहीं है कि यदि उसके पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो वो बहस के अनुकूल मंच को दरकिनार करते हुए अध्यादेश जारी करें. हमारे प्रजातंत्र में ये कदापि मान्य नहीं है. इस मौजूदा सरकार ने इतने कम समय में 8 टुकडों में अस्थायी कानूनों पर जोर दिया है जिनमें से सबसे विवादस्पद हैं- कोल, भूमि अधिग्रहण, बिमा और हाल ही में खनिज.आम आदमी इस बात को अब कहने लगा है कि यह सरकार सिर्फ व्यापारी समुदाय को सन्देश दे रही है कि सरकार की सहानुभुति सिर्फ इन्हीं तक निहित है, क्योंकि अभी तक इस देश के गरीब और आम आदमी तक कोई फायदा नहीं पहुँचा है. लोग यह समझ चुके हैं कि अध्यादेश के जरिये इतने सारे बिल पास करने से संसदीय गतिविधि में अवरोध उत्पन्न होता है जहाँ बिल के गुण और दोष को लेकर संसद के पटल पर बहस होती है.मैं यूनियन ऑफ कोल इंडिया लिमिटेड के कर्मचारियों का स्वागत करता हूँ कि उन्होंने जो निजी कंपनियों को कोयले की नीलामी पर अध्यादेश जारी किया गया था, उसके खिलाफ आवाज उठायी. उन्होंने 5 दिन के बंद की घोषणा की, मुझे इस बात का डर है कि यदि उनकी मांगों को पूरा नहीं किया गया तो देश को बिजली की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. मेरे विचार से हमारे देश के पी.एस.यू कोल इंडिया के पास किसी भी निजी कंपनियों की तुलना में बेहतर विशेषज्ञ हैं. वैसे भी जो लोग निजी कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत हैं, वे सभी पी.एस.यू के ही सेवा निवृत्त पदाधिकारी हैं, चाहे वो कोल इंडिया से हों या ए.न.टी.पी.सी से. यह बताते हुए सुखद अनुभूति होती है कि कोल इंडिया ने अपनी पैदावार क्षमाता को दो गुना करते हुए 21० मिलियन टन जो 1992-93 में था वो अब 462 मिलियन टन हो चुका है, जबकि निजी कंपनियां जिन्हें कोल ब्लॉक आवंटित किये गए थे, वह सिर्फ 46 मिलियन टन ही कोयला पैदा कर सके. लोगों में यह गलत धारणा है कि कोयले की कमी भारत में कोल इंडिया की वजह से है, यह सरासर गलत है. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा कि इस सरकार को क्या हो गया है कि वह सिर्फ बड़े कॉरपोरेट घरानों को ही खुश करने में लगी है.पी.एस.यू के कर्मचारी और आम लोग यह कहने लगे हैं कि सरकार हड़बड़ी में अस्थायी कानून ला रही है प्रधानमन्त्री जब से विभिन्न देशों का दौरा करके आएं हैं जहाँ उन्होंने व्यावसायिक समुदायों से बड़े बड़े वादे किये. मुझे नहीं लगता की व्यावसायिक समुदायों का मनोबल बढ़ेगा जिस तरह से अध्यादेश पारित किये जा रहे हैं. जहाँ एक तरफ सरकार प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को खत्म कर रही है वहीँ दूसरी तरफ सरकार अपने लक्ष्य को पाने में असफल साबित हुई.
मुझे इस बात से काफी अफ़सोस है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश जिस पर हम सभी को गर्व है, उस लोकतंत्र पर आघात करने के लिए ये सरकार आमादा है. जब से यह सरकार सत्ता में आई है, ऐसा लगता है कि वो यही सोचकर सत्ता में आई थी की इन्हें विपक्षी दलों के विचारों को दरकिनार करते हुए एक दलीय सरकार को ही चलाना है. सरकार ने संसद की संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए अध्यादेश को पारित करने की राह को चुना है. हमें आज भी याद है, यू पी ए के शासनकाल में यही भाजपा थी जो ये बार बार कहती थी की इमरजेंसी के वक़्त ही देशहित में अध्यादेश पारित होना चाहिए. वहीँ आज के हालात पर गौर करें तो यही भाजपा अपने वक्तात्यों से पलटते हुए संसद के आखिरी सत्र के एक दिन बाद ही अध्यादेश को जारी किया और संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया. अगर सही से याद करें तो ऐसा संसद के इतिहास में कभी नहीं हुआ था कि सत्र के स्थगित होने के बाद अध्यादेशों की एक कड़ी पारित हुई हो. हमने ऐसा इमरजेंसी के दौरान ही देखा था जब लगातार अध्यादेश जारी किये गए थे. कोई भी यह समझ सकता है कि संसद सत्र जब ना चल रहा हो, उस वक़्त अध्यादेश समझ में तो आता है, लेकिन अगर चुनी हुई सरकार लगातार अध्यादेश जारी करने की राह अपनाये तो यह प्रजातंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है. यह इस बात को दर्शाता है की सरकार इतने गंभीर कानूनों पर बहस कर पाने में असमर्थ थी. एक सरकार के दृष्टिकोण से यह सही नहीं है कि यदि उसके पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो वो बहस के अनुकूल मंच को दरकिनार करते हुए अध्यादेश जारी करें. हमारे प्रजातंत्र में ये कदापि मान्य नहीं है. इस मौजूदा सरकार ने इतने कम समय में 8 टुकडों में अस्थायी कानूनों पर जोर दिया है जिनमें से सबसे विवादस्पद हैं- कोल, भूमि अधिग्रहण, बिमा और हाल ही में खनिज.आम आदमी इस बात को अब कहने लगा है कि यह सरकार सिर्फ व्यापारी समुदाय को सन्देश दे रही है कि सरकार की सहानुभुति सिर्फ इन्हीं तक निहित है, क्योंकि अभी तक इस देश के गरीब और आम आदमी तक कोई फायदा नहीं पहुँचा है. लोग यह समझ चुके हैं कि अध्यादेश के जरिये इतने सारे बिल पास करने से संसदीय गतिविधि में अवरोध उत्पन्न होता है जहाँ बिल के गुण और दोष को लेकर संसद के पटल पर बहस होती है.मैं यूनियन ऑफ कोल इंडिया लिमिटेड के कर्मचारियों का स्वागत करता हूँ कि उन्होंने जो निजी कंपनियों को कोयले की नीलामी पर अध्यादेश जारी किया गया था, उसके खिलाफ आवाज उठायी. उन्होंने 5 दिन के बंद की घोषणा की, मुझे इस बात का डर है कि यदि उनकी मांगों को पूरा नहीं किया गया तो देश को बिजली की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. मेरे विचार से हमारे देश के पी.एस.यू कोल इंडिया के पास किसी भी निजी कंपनियों की तुलना में बेहतर विशेषज्ञ हैं. वैसे भी जो लोग निजी कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत हैं, वे सभी पी.एस.यू के ही सेवा निवृत्त पदाधिकारी हैं, चाहे वो कोल इंडिया से हों या ए.न.टी.पी.सी से. यह बताते हुए सुखद अनुभूति होती है कि कोल इंडिया ने अपनी पैदावार क्षमाता को दो गुना करते हुए 21० मिलियन टन जो 1992-93 में था वो अब 462 मिलियन टन हो चुका है, जबकि निजी कंपनियां जिन्हें कोल ब्लॉक आवंटित किये गए थे, वह सिर्फ 46 मिलियन टन ही कोयला पैदा कर सके. लोगों में यह गलत धारणा है कि कोयले की कमी भारत में कोल इंडिया की वजह से है, यह सरासर गलत है. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा कि इस सरकार को क्या हो गया है कि वह सिर्फ बड़े कॉरपोरेट घरानों को ही खुश करने में लगी है.पी.एस.यू के कर्मचारी और आम लोग यह कहने लगे हैं कि सरकार हड़बड़ी में अस्थायी कानून ला रही है प्रधानमन्त्री जब से विभिन्न देशों का दौरा करके आएं हैं जहाँ उन्होंने व्यावसायिक समुदायों से बड़े बड़े वादे किये. मुझे नहीं लगता की व्यावसायिक समुदायों का मनोबल बढ़ेगा जिस तरह से अध्यादेश पारित किये जा रहे हैं. जहाँ एक तरफ सरकार प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को खत्म कर रही है वहीँ दूसरी तरफ सरकार अपने लक्ष्य को पाने में असफल साबित हुई.
Tuesday, 6 January 2015
अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखे केंद्र
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए नीतियां अहम होती हैं। फिलहाल अर्थव्यवस्था को लेकर जिस तरह के कदम उठने चाहिए थे, उस पर सरकार का गंभीर रवैया नहीं दिख रहा है। सरकार का ये उदासीन रवैया उस वक्त है जब शेयर बाजार में हाहाकार मचा हुआ है। सरकार को सबसे पहले अपनी कृषि पर ध्यान देना होगा। भारत एक कृषि प्रधान देश है, हम उसी को छोड़ कर दूसरी तरफ लग गए हैं। विनिर्माण क्षेत्र की तरफ भी ध्यान देने कि ज़रूरत है। मैं आर्थिक सुधारों के खिलाफ नहीं हूँ, मगर हमको पहले अपने भीतर की ताकत को मजबूत बनाना होगा जैसा कि चीन ने किया हुआ है। चीन सिर्फ विदेशी पूंजी पर ही निर्भर नहीं है। मगर हम तो दिन प्रतिदिन अपने आप को विदेशी पूंजी पर ही निर्भर करते जा रहे हैं। सरकार को इस सन्दर्भ में दिशा परिवर्तन करना चाहिए।
क्या 'योजना’ में भरोसा नहीं रहा सरकार को ?
आखिर 'नीति आयोग’ ही क्यों? वर्ष 195० में बने 'योजना आयोग’ को एक झटके में खत्म करने का क्या मतलब है ? क्या केंद्र सरकार को 'योजना’ पर भरोसा नहीं था, या इस देश को कॉरपोरेट्स के हाथों में सौंपने की बहुत बड़ी साजिश हो रही है? ये कई सवाल हैं जिसका जवाब देश आज जानना चाहता है। सरकार को अगर इसमें परिवर्तन ही लाना था तो 'योजना आयोग’के अंतर्गत ही नीतियों, दिशा-निर्देशों में परिवर्तन लाकर भी उसे कार्यान्वित किया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसा डर है कि 'नीति आयोग’ के पीछे नीति बनाने में कॉर्पोरेट्स की ही चलेगी। योजना आयोग में राज्य सरकारों से विचार विमर्श होता था जो एक सही प्रयोग था क्योंकि चर्चा से ही सही रस्ते निकलते हैं। संघीय संरचना को मजबूत रखने के लिए मैं समझता हूँ कि योजना आयोग में बदलाव करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। अभी केवल राज्यों को वित्त मंत्रालय के अनुसार ही चलना होगा और इसके साथ-साथ चर्चा का मंच भी ख़त्म हो जायेगा जो प्रजातंत्र के लिए ठीक नहीं होगा।
Monday, 5 January 2015
फर्जी वोटरों की जांच होने के बाद ही हो चुनाव
दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले फर्जी वोटरों का मामला कई न्यूज़ चैनल्स दिखा रहे हैं, यह काफी दुखद और आपत्तिजनक है। न्यूज चैनलों के खुलासों में बताया गया है कि वोटरों के पते और नाम तो अलग हैं, लेकिन चेहरा एक है। असल में कुछ राजनीतिक दल वोट बटोरने के लिए वोटर लिस्ट में धांधली करने की योजना बना रहे हैं।
पैसों की आड़ में इस तरह का फर्जी खेल लोकतंत्र के लिए विष के बराबर है, जहां घूसखोरी से लेकर तमाम गोरखधंधों को अंजाम दिया जाता है। चुनाव आयोग समेत सरकार से गुजारिश है कि ऐसे मामलों की निष्पक्षता से जांच हो और जांच पूरी होने के बाद ही दिल्ली में चुनाव हो। यह भारतीय राजनीति और प्रजातंत्र के साथ घिनौना मजाक है। ऐसे कृत्यों में शामिल अधिकारियों को भी कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए, क्योंकि ऐसे में तो जनता का लोकतंत्र से भरोसा ही उठ जाएगा।
Sunday, 4 January 2015
देश की अर्थव्यवस्था पर किसी का ध्यान नहीं
यह हमारे देश के साथ दुर्भाग्य और युवाओं के अन्याय ही कहा जाएगा क्योंकि देश का लाखों-करोड़ों रुपए पूंजीपतियों की जेब में जा रहा है और जनता एक-एक रुपए जोड़ने के लिए दिन-रात मेहनत में जुटी है। एक रिपोर्ट काफी चौंकाने वाली है। रिपोर्ट की मानें तो बैंकिंग सेक्टर जिस रियल इस्टेट को चमकाने के लिए अब तक लगे हुए थे, इसका खामियाजा बड़े पैमाने पर आज देश भुगत रहा है। रियल इस्सेट में पूंजीपतियों पर बढ़ती हुई गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) के कारण यह आज अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बन चुकी है, जिस पर सरकार का कोई ध्यान ही नहीं है। रियल इस्टेट की आड़ में बैंकों से पूंजी लेकर उसका दुरुपयोग जहां दो-तीन वर्ष पहले थोड़ा कम हुआ करता था, वह आज लगभग डेढ़ गुने से भी कहीं अधिक हो चुका है। 2०11-12 के दौरान एनपीए का आंकड़ा जहां 1०.8 फीसदी था, वह आज 2०13-14 के दौरान बढ़कर 18.6 फीसदी हो चुका है। यह केंद्र सरकार की लापरवाही का ही नतीजा है कि पांच वर्ष पहले जहां एक ओर बैंक इन रियल इस्टेट पर 5.8 लाख करोड़ का निवेश कर चुकी थी, वहीं आज यह सीधा दोगुना, यानी 1०.94 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है।
सवाल है कि एक तरफ केंद्र सरकार देश में काला धन लाने की बातें करती है। वह भी केवल बातों में ही रह जाता है। मुद्दे भटका दिए जाते हैं। वहीं दूसरी ओर, देश का इतना पैसा अगर पूंजीपतियों की हाथों में होगा तो देश में निम्न और मध्यम वर्गों का विकास कैसे संभव है? यह सोचने वाली है। क्या केंद्र सरकार के नुमाइंदों को नहीं पता कि लाखों लोग आज भी भूखे पेट सोते हैं? क्या देश के शीर्षस्थ को यह नहीं पता कि इस चौपट होती अर्थव्यवस्था से देश विनाश के रास्ते चल पड़ा है, जहां अमीर अधिक अमीर होते जा रहे हैं और गरीब अधिक गरीब हो रहे हैं। पता होता तो सरकार इसे गंभीरता से लेती, मगर ऐसा नहीं है।
यह देश के युवाओं के साथ अन्याय है। क्योंकि यह युवाओं का देश है। हिन्दुस्तान में करीब 7० फीसदी आबादी युवाओं की है। देश के युवा एक तरफ तो रोजी-रोटी की तलाश में दिनभर धक्के खा रहे हैं, वहीं केंद्र सरकार के इन लापरवाह रवैये के कारण लाखों करोड़ रुपए को पूंजीपतियों की जेब में डाल दिया जा रहा है। देश के युवाओं को इस मामले के खिलाफ आगे आना चाहिए, क्योंकि इस देश को युवा ही पटरी पर ला सकते हैं।
Friday, 2 January 2015
युवा लक्ष्य निर्धारित करें, आगे बढ़ें
सबसे पहले आप सभी युवा बंधुओं को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। यह देश युवाओं का देश है। युवाओं के बेहतर भविष्य को लेकर ही इस देश में बेहतरी की कल्पना की जा सकती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश को जिन्होंने नया आयाम दिया, देश-प्रेम के लिए इतिहास रचा, वो युवा ही थे। हर एक युवा पर देश को संवारने और सही दिशा पर ले जाने की जिम्मेदारी है। मित्रों, यह नए वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं। नया लक्ष्य बनाइए, उस लक्ष्य को पाने के लिए मेहनत कीजिए। जीत हमेशा आपकी होगी।
Subscribe to:
Posts (Atom)






