आज (7 जनवरी 2०15) मैंने अपने आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया, उस कॉन्फ्रेंस में मैंने सरकार के रवैये पर अपनी राय व्यक्त की।
मुझे इस बात से काफी अफ़सोस है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश जिस पर हम सभी को गर्व है, उस लोकतंत्र पर आघात करने के लिए ये सरकार आमादा है. जब से यह सरकार सत्ता में आई है, ऐसा लगता है कि वो यही सोचकर सत्ता में आई थी की इन्हें विपक्षी दलों के विचारों को दरकिनार करते हुए एक दलीय सरकार को ही चलाना है. सरकार ने संसद की संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए अध्यादेश को पारित करने की राह को चुना है. हमें आज भी याद है, यू पी ए के शासनकाल में यही भाजपा थी जो ये बार बार कहती थी की इमरजेंसी के वक़्त ही देशहित में अध्यादेश पारित होना चाहिए. वहीँ आज के हालात पर गौर करें तो यही भाजपा अपने वक्तात्यों से पलटते हुए संसद के आखिरी सत्र के एक दिन बाद ही अध्यादेश को जारी किया और संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया. अगर सही से याद करें तो ऐसा संसद के इतिहास में कभी नहीं हुआ था कि सत्र के स्थगित होने के बाद अध्यादेशों की एक कड़ी पारित हुई हो. हमने ऐसा इमरजेंसी के दौरान ही देखा था जब लगातार अध्यादेश जारी किये गए थे. कोई भी यह समझ सकता है कि संसद सत्र जब ना चल रहा हो, उस वक़्त अध्यादेश समझ में तो आता है, लेकिन अगर चुनी हुई सरकार लगातार अध्यादेश जारी करने की राह अपनाये तो यह प्रजातंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है. यह इस बात को दर्शाता है की सरकार इतने गंभीर कानूनों पर बहस कर पाने में असमर्थ थी. एक सरकार के दृष्टिकोण से यह सही नहीं है कि यदि उसके पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो वो बहस के अनुकूल मंच को दरकिनार करते हुए अध्यादेश जारी करें. हमारे प्रजातंत्र में ये कदापि मान्य नहीं है. इस मौजूदा सरकार ने इतने कम समय में 8 टुकडों में अस्थायी कानूनों पर जोर दिया है जिनमें से सबसे विवादस्पद हैं- कोल, भूमि अधिग्रहण, बिमा और हाल ही में खनिज.आम आदमी इस बात को अब कहने लगा है कि यह सरकार सिर्फ व्यापारी समुदाय को सन्देश दे रही है कि सरकार की सहानुभुति सिर्फ इन्हीं तक निहित है, क्योंकि अभी तक इस देश के गरीब और आम आदमी तक कोई फायदा नहीं पहुँचा है. लोग यह समझ चुके हैं कि अध्यादेश के जरिये इतने सारे बिल पास करने से संसदीय गतिविधि में अवरोध उत्पन्न होता है जहाँ बिल के गुण और दोष को लेकर संसद के पटल पर बहस होती है.मैं यूनियन ऑफ कोल इंडिया लिमिटेड के कर्मचारियों का स्वागत करता हूँ कि उन्होंने जो निजी कंपनियों को कोयले की नीलामी पर अध्यादेश जारी किया गया था, उसके खिलाफ आवाज उठायी. उन्होंने 5 दिन के बंद की घोषणा की, मुझे इस बात का डर है कि यदि उनकी मांगों को पूरा नहीं किया गया तो देश को बिजली की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. मेरे विचार से हमारे देश के पी.एस.यू कोल इंडिया के पास किसी भी निजी कंपनियों की तुलना में बेहतर विशेषज्ञ हैं. वैसे भी जो लोग निजी कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत हैं, वे सभी पी.एस.यू के ही सेवा निवृत्त पदाधिकारी हैं, चाहे वो कोल इंडिया से हों या ए.न.टी.पी.सी से. यह बताते हुए सुखद अनुभूति होती है कि कोल इंडिया ने अपनी पैदावार क्षमाता को दो गुना करते हुए 21० मिलियन टन जो 1992-93 में था वो अब 462 मिलियन टन हो चुका है, जबकि निजी कंपनियां जिन्हें कोल ब्लॉक आवंटित किये गए थे, वह सिर्फ 46 मिलियन टन ही कोयला पैदा कर सके. लोगों में यह गलत धारणा है कि कोयले की कमी भारत में कोल इंडिया की वजह से है, यह सरासर गलत है. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा कि इस सरकार को क्या हो गया है कि वह सिर्फ बड़े कॉरपोरेट घरानों को ही खुश करने में लगी है.पी.एस.यू के कर्मचारी और आम लोग यह कहने लगे हैं कि सरकार हड़बड़ी में अस्थायी कानून ला रही है प्रधानमन्त्री जब से विभिन्न देशों का दौरा करके आएं हैं जहाँ उन्होंने व्यावसायिक समुदायों से बड़े बड़े वादे किये. मुझे नहीं लगता की व्यावसायिक समुदायों का मनोबल बढ़ेगा जिस तरह से अध्यादेश पारित किये जा रहे हैं. जहाँ एक तरफ सरकार प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को खत्म कर रही है वहीँ दूसरी तरफ सरकार अपने लक्ष्य को पाने में असफल साबित हुई.
मुझे इस बात से काफी अफ़सोस है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश जिस पर हम सभी को गर्व है, उस लोकतंत्र पर आघात करने के लिए ये सरकार आमादा है. जब से यह सरकार सत्ता में आई है, ऐसा लगता है कि वो यही सोचकर सत्ता में आई थी की इन्हें विपक्षी दलों के विचारों को दरकिनार करते हुए एक दलीय सरकार को ही चलाना है. सरकार ने संसद की संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए अध्यादेश को पारित करने की राह को चुना है. हमें आज भी याद है, यू पी ए के शासनकाल में यही भाजपा थी जो ये बार बार कहती थी की इमरजेंसी के वक़्त ही देशहित में अध्यादेश पारित होना चाहिए. वहीँ आज के हालात पर गौर करें तो यही भाजपा अपने वक्तात्यों से पलटते हुए संसद के आखिरी सत्र के एक दिन बाद ही अध्यादेश को जारी किया और संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया. अगर सही से याद करें तो ऐसा संसद के इतिहास में कभी नहीं हुआ था कि सत्र के स्थगित होने के बाद अध्यादेशों की एक कड़ी पारित हुई हो. हमने ऐसा इमरजेंसी के दौरान ही देखा था जब लगातार अध्यादेश जारी किये गए थे. कोई भी यह समझ सकता है कि संसद सत्र जब ना चल रहा हो, उस वक़्त अध्यादेश समझ में तो आता है, लेकिन अगर चुनी हुई सरकार लगातार अध्यादेश जारी करने की राह अपनाये तो यह प्रजातंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है. यह इस बात को दर्शाता है की सरकार इतने गंभीर कानूनों पर बहस कर पाने में असमर्थ थी. एक सरकार के दृष्टिकोण से यह सही नहीं है कि यदि उसके पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो वो बहस के अनुकूल मंच को दरकिनार करते हुए अध्यादेश जारी करें. हमारे प्रजातंत्र में ये कदापि मान्य नहीं है. इस मौजूदा सरकार ने इतने कम समय में 8 टुकडों में अस्थायी कानूनों पर जोर दिया है जिनमें से सबसे विवादस्पद हैं- कोल, भूमि अधिग्रहण, बिमा और हाल ही में खनिज.आम आदमी इस बात को अब कहने लगा है कि यह सरकार सिर्फ व्यापारी समुदाय को सन्देश दे रही है कि सरकार की सहानुभुति सिर्फ इन्हीं तक निहित है, क्योंकि अभी तक इस देश के गरीब और आम आदमी तक कोई फायदा नहीं पहुँचा है. लोग यह समझ चुके हैं कि अध्यादेश के जरिये इतने सारे बिल पास करने से संसदीय गतिविधि में अवरोध उत्पन्न होता है जहाँ बिल के गुण और दोष को लेकर संसद के पटल पर बहस होती है.मैं यूनियन ऑफ कोल इंडिया लिमिटेड के कर्मचारियों का स्वागत करता हूँ कि उन्होंने जो निजी कंपनियों को कोयले की नीलामी पर अध्यादेश जारी किया गया था, उसके खिलाफ आवाज उठायी. उन्होंने 5 दिन के बंद की घोषणा की, मुझे इस बात का डर है कि यदि उनकी मांगों को पूरा नहीं किया गया तो देश को बिजली की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. मेरे विचार से हमारे देश के पी.एस.यू कोल इंडिया के पास किसी भी निजी कंपनियों की तुलना में बेहतर विशेषज्ञ हैं. वैसे भी जो लोग निजी कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत हैं, वे सभी पी.एस.यू के ही सेवा निवृत्त पदाधिकारी हैं, चाहे वो कोल इंडिया से हों या ए.न.टी.पी.सी से. यह बताते हुए सुखद अनुभूति होती है कि कोल इंडिया ने अपनी पैदावार क्षमाता को दो गुना करते हुए 21० मिलियन टन जो 1992-93 में था वो अब 462 मिलियन टन हो चुका है, जबकि निजी कंपनियां जिन्हें कोल ब्लॉक आवंटित किये गए थे, वह सिर्फ 46 मिलियन टन ही कोयला पैदा कर सके. लोगों में यह गलत धारणा है कि कोयले की कमी भारत में कोल इंडिया की वजह से है, यह सरासर गलत है. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा कि इस सरकार को क्या हो गया है कि वह सिर्फ बड़े कॉरपोरेट घरानों को ही खुश करने में लगी है.पी.एस.यू के कर्मचारी और आम लोग यह कहने लगे हैं कि सरकार हड़बड़ी में अस्थायी कानून ला रही है प्रधानमन्त्री जब से विभिन्न देशों का दौरा करके आएं हैं जहाँ उन्होंने व्यावसायिक समुदायों से बड़े बड़े वादे किये. मुझे नहीं लगता की व्यावसायिक समुदायों का मनोबल बढ़ेगा जिस तरह से अध्यादेश पारित किये जा रहे हैं. जहाँ एक तरफ सरकार प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को खत्म कर रही है वहीँ दूसरी तरफ सरकार अपने लक्ष्य को पाने में असफल साबित हुई.

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