यह हमारे देश के साथ दुर्भाग्य और युवाओं के अन्याय ही कहा जाएगा क्योंकि देश का लाखों-करोड़ों रुपए पूंजीपतियों की जेब में जा रहा है और जनता एक-एक रुपए जोड़ने के लिए दिन-रात मेहनत में जुटी है। एक रिपोर्ट काफी चौंकाने वाली है। रिपोर्ट की मानें तो बैंकिंग सेक्टर जिस रियल इस्टेट को चमकाने के लिए अब तक लगे हुए थे, इसका खामियाजा बड़े पैमाने पर आज देश भुगत रहा है। रियल इस्सेट में पूंजीपतियों पर बढ़ती हुई गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) के कारण यह आज अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बन चुकी है, जिस पर सरकार का कोई ध्यान ही नहीं है। रियल इस्टेट की आड़ में बैंकों से पूंजी लेकर उसका दुरुपयोग जहां दो-तीन वर्ष पहले थोड़ा कम हुआ करता था, वह आज लगभग डेढ़ गुने से भी कहीं अधिक हो चुका है। 2०11-12 के दौरान एनपीए का आंकड़ा जहां 1०.8 फीसदी था, वह आज 2०13-14 के दौरान बढ़कर 18.6 फीसदी हो चुका है। यह केंद्र सरकार की लापरवाही का ही नतीजा है कि पांच वर्ष पहले जहां एक ओर बैंक इन रियल इस्टेट पर 5.8 लाख करोड़ का निवेश कर चुकी थी, वहीं आज यह सीधा दोगुना, यानी 1०.94 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है।
सवाल है कि एक तरफ केंद्र सरकार देश में काला धन लाने की बातें करती है। वह भी केवल बातों में ही रह जाता है। मुद्दे भटका दिए जाते हैं। वहीं दूसरी ओर, देश का इतना पैसा अगर पूंजीपतियों की हाथों में होगा तो देश में निम्न और मध्यम वर्गों का विकास कैसे संभव है? यह सोचने वाली है। क्या केंद्र सरकार के नुमाइंदों को नहीं पता कि लाखों लोग आज भी भूखे पेट सोते हैं? क्या देश के शीर्षस्थ को यह नहीं पता कि इस चौपट होती अर्थव्यवस्था से देश विनाश के रास्ते चल पड़ा है, जहां अमीर अधिक अमीर होते जा रहे हैं और गरीब अधिक गरीब हो रहे हैं। पता होता तो सरकार इसे गंभीरता से लेती, मगर ऐसा नहीं है।
यह देश के युवाओं के साथ अन्याय है। क्योंकि यह युवाओं का देश है। हिन्दुस्तान में करीब 7० फीसदी आबादी युवाओं की है। देश के युवा एक तरफ तो रोजी-रोटी की तलाश में दिनभर धक्के खा रहे हैं, वहीं केंद्र सरकार के इन लापरवाह रवैये के कारण लाखों करोड़ रुपए को पूंजीपतियों की जेब में डाल दिया जा रहा है। देश के युवाओं को इस मामले के खिलाफ आगे आना चाहिए, क्योंकि इस देश को युवा ही पटरी पर ला सकते हैं।

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