क्या 'योजना’ में भरोसा नहीं रहा सरकार को ?
आखिर 'नीति आयोग’ ही क्यों? वर्ष 195० में बने 'योजना आयोग’ को एक झटके में खत्म करने का क्या मतलब है ? क्या केंद्र सरकार को 'योजना’ पर भरोसा नहीं था, या इस देश को कॉरपोरेट्स के हाथों में सौंपने की बहुत बड़ी साजिश हो रही है? ये कई सवाल हैं जिसका जवाब देश आज जानना चाहता है। सरकार को अगर इसमें परिवर्तन ही लाना था तो 'योजना आयोग’के अंतर्गत ही नीतियों, दिशा-निर्देशों में परिवर्तन लाकर भी उसे कार्यान्वित किया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसा डर है कि 'नीति आयोग’ के पीछे नीति बनाने में कॉर्पोरेट्स की ही चलेगी। योजना आयोग में राज्य सरकारों से विचार विमर्श होता था जो एक सही प्रयोग था क्योंकि चर्चा से ही सही रस्ते निकलते हैं। संघीय संरचना को मजबूत रखने के लिए मैं समझता हूँ कि योजना आयोग में बदलाव करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। अभी केवल राज्यों को वित्त मंत्रालय के अनुसार ही चलना होगा और इसके साथ-साथ चर्चा का मंच भी ख़त्म हो जायेगा जो प्रजातंत्र के लिए ठीक नहीं होगा।
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