Friday, 16 January 2015

सेंसर बोर्ड प्रकरण की हो जाँच !


सेंसर बोर्ड की चेयरपर्सन का मुद्दा हमारे सामने आया है। यह इस बात को दर्शाता है कि सेंसर बोर्ड की किस तरह से अनदेखी हो रही है। विवादस्पद फिल्म मैसेंजर ऑफ़ गॉड को फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण ने हरी झंडी दे दी जिसकी मैं घोर निंदा करता हूँ क्यूंकि जब 'सेंसर बोर्ड एक आजाद संस्था है और जब उसने इसकी इजाजत नहीं दी थी तो ऐसा करना कतई जायज नहीं माना जा सकता क्यूंकि इससे न सिर्फ सेंसर बोर्ड कि स्वाधीनता पर सवाल खड़ा होता है बल्कि  इस तरह कि फिल्मों से देश में हालात बिगड़ते हैं। सेंसर बोर्ड प्रमुख ने जिस तरह से इसपर नाराजगी जताई है वह जायज है और मैं उनके द्वारा लिए गए स्तीफे के फैसले का स्वागत करता हूँ. डेरा सच्चा सौदा प्रमुख बाबा राम रहीम की फिल्म द मैसेंजर ऑफ गॉड' के रिलीज को लेकर केंद्र द्वारा दबाव बनाए जाने का मैं पुरजोर विरोध करता हूँ क्यूंकि जिस तरह से शुक्रवार को सेंसर बोर्ड की एक अन्य सदस्य इरा भास्कर ने भी इस्तीफा दिया वह दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार को यह समझना चाहिए कि फिल्म के प्रदर्शन को लेकर जब पंजाब और हरियाणा में प्रदर्शन भी हुए तो ऐसे फिल्म को हरी झंडी कैसे दी जा सकती है? जब सैमसन ने कहा था कि सेंसर बोर्ड की ओर से लिखित तौर पर इस फिल्म को रिलीज करने की अनुमति अभी तक नहीं दी गई है तो फिर ऐसे फिल्म को कैसे रिलीज़ करने की अनुमति दी गयी। साथ ही साथ लीला सैमसन द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप कि भी जांच होनी चाहिए। इसके अलावा आम तौर पर जब ट्रिब्यूनल 15 से 30 दिन में फिल्म की रिलीज पर फैसला लेता है तो ऐसे में 'मैसेंजर ऑफ गॉड' को 24 घंटे में कैसे अनुमति मिल गई इसकी भी जांच होनी चाहिए।

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