Saturday, 31 January 2015
Thursday, 29 January 2015
70 फीसदी से अधिक नरेगा मजदूरी बकाया, अविलंब भुगतान करे सरकार
हाल में ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर
से एक आंकड़ा आया है जिसमें बताया गया है कि एनडीए सरकार के शासनकाल में इस वित्तीय
वर्ष के दौरान 70 फीसदी से अधिक नरेगा मजदूरी का
भुगतान नहीं हुआ है। इसी महीने ग्रामीण विकास मंत्रालय
द्बारा इस योजना की एक आंतरिक समीक्षा बैठक के पहले पेश किए गए एक आंकड़े के अनुसार, निर्धारित की गई
रकम से केवल 28.22 फीसदी ही भुगतान हुआ। वहीं मंत्रालय
की लापरवाही की वजह से 15
दिसंबर 2014 तक यह आंकड़ा 72 फीसदी तक पहुंच
गया। रिपोर्ट में तो यह भी बताया गया है कि 90 दिनों के बाद करीब
9 फीसदी का ही भुगतान हुआ। केंद्र सरकार को मजदूरों के साथ कम से
कम इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए। मनरेगा के अंतर्गत जो वर्ष में 100 दिन रोजगार का वादा किया गया था, उसके साथ किसी तरह
की अनदेखी इस देश की गरीब जनता के साथ धोखा है। इसे देखकर यह लगता है कि यह सरकार
गरीबों की हितैषी है ही नहीं।
Wednesday, 28 January 2015
अमेरिकी राष्ट्रपति के मंतव्य से सीख ले सरकार
बहुत ख़ुशी की बात है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का तीन दिवसीय कार्यक्रम भारत में हुआ. लोगों ने फील गुड तो किया लेकिन इंडिया शाइनिंग का सारा मामला डॉउटफुल सा लगता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने धार्मिक सहिष्णुता को लेकर जिस तरह आगाह किया है, उससे सत्तासीन सरकार को सीख लेनी चाहिए। जाते जाते ओबामा हकीकत बयां कर गए और उन्होंने साफ कहा कि रिलिजियस टॉलरेंस के बिना किसी देश का विकास संभव नहीं है, इस पर हर हाल में अमल होना चाहिए।
Tuesday, 27 January 2015
गणतंत्र दिवस के फॉर्मेट को बदलना चाहिए : शरद यादव
मैंने मीडिया में पढ़ा और देखा कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर किस तरह से कई राज्यों की झांकी आदि दिखाने में पक्षपात हुआ। मेरा मानना है कि गणतंत्र दिवस के फॉर्मेट को बदलना चाहिए जो कि सालो साल से वही चलता आ रहा है। हम अपने संविधान के प्रति किस तरह से युवाओं की रूचि इसमें ला सकते हैं और कैसे उसमे कुछ मनोरंजन का रूप देकर दिखाया जा सकता है उसपर सोचना चाहिए।
हमें बाबा अम्बेडकर को याद करते हुए उनकी जीवनी पर कुछ रोमांचक तथ्य देकर जनता को दिखाना चाहिए। मेरा मानना है कि गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर इतना खर्च होता है उसे बचाया जा सकता है। हमें ऐसे कदम उठाने चाहिए कि इस समारोह पर कम खर्च करके देश के संविधान के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके।
हमें बाबा अम्बेडकर को याद करते हुए उनकी जीवनी पर कुछ रोमांचक तथ्य देकर जनता को दिखाना चाहिए। मेरा मानना है कि गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर इतना खर्च होता है उसे बचाया जा सकता है। हमें ऐसे कदम उठाने चाहिए कि इस समारोह पर कम खर्च करके देश के संविधान के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके।
Monday, 26 January 2015
समाज को सच का आइना दिखाने वाले नायक थे आर. के. लक्ष्मण
रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण के निधन की खबर सुनकर मुझे अत्यंत पीड़ा
हुई।
देश ने आज एक अनमोल रत्न खो दिया है। आर. के. लक्ष्मण भारत के न
सिर्फ एक प्रमुख व्यंग-चित्रकार थे, बल्कि वो आम आदमी की पीड़ा को अपनी
कूची से गढ़कर, अपने चित्रों से वे पिछले
अर्द्धशती से लोगों को बताते आ रहे थे। समाज की विकृतियों, राजनीतिक विदूषकों और उनकी
विचारधारा के विषमताओं पर भी उन्होंने तीख़े ब्रश चलाये और लोगों को जागरूक करते
रहे। आर. के. लक्ष्मण को उनके
योगदान के लिए कई अवार्ड्स भी मिले। लक्ष्मण सबसे ज़यादा अपने कॉमिक स्ट्रिप
"द कॉमन मैन" जो उन्होंने द टाईम्स ऑफ़ इंडिया में लिखा था, के लिए प्रसिद्ध हुए। मैं इस महान
चित्रकार को नमन करता हूं और प्रार्थना करता हूं कि उन्हें सद्गति प्राप्त हो। साथ
ही शोक संतप्त परिवार एवं तमाम देशवाशियों को इस पीड़ा को सहन करने की शक्ति मिले।
Sunday, 25 January 2015
Saturday, 24 January 2015
Friday, 23 January 2015
Thursday, 22 January 2015
Wednesday, 21 January 2015
देशहित में नहीं एयरपोर्टस निजीकरण
सरकार निजीकरण का ऐसा पासा फेंक रही है जिसे देशहित में कतई नहीं कहा जा सकता। फिलहाल एयरपोर्टस निजीकरण का मसला गंभीर है। हमने कई बार इस पर आपत्ति जताई है। सरकार की इन नीतियों पर विरोध भी शुरू हो चुका है। सबको पता चल गया है कि सरकार इन हालात में निजी व विदेशी निवेश लाने का मंसूबा तैयार कर रही है। सरकार के निजीकरण प्रयासों को लेकर रेल यूनियनों का विरोध तो था ही, अब हवाई अड्डों के निजीकरण के खिलाफ भी कई यूनियनों ने इसका विरोध कर दिया है। एयरपोर्ट अथारिटी एंप्लाईज यूनियन ने चार हवाई अड्डों के निजीकरण के खिलाफ सरकार को हड़ताल की चेतावनी दी है। जिनमें कोलकाता, चेन्नई, जयपुर और अहमदाबाद हवाई अड्डे शामिल हैं।
जनता के पैसे से इतने बढ़िया एयरपोर्ट बनाने और अनुभव हासिल करने के बाद एयरपोर्ट अथारिटी के हवाई अड्डों को बेहतर प्रबंधन के नाम पर निजी कंपनियों के हवाले करना न तो जनता और न ही कर्मचारियों के हित में हो सकता है। वैसे भी कोलकाता व चेन्नई एयरपोर्ट पर अथारिटी के 4००० कर्मचारी तैनात हैं। उनका क्या होगा?
जनता के पैसे से इतने बढ़िया एयरपोर्ट बनाने और अनुभव हासिल करने के बाद एयरपोर्ट अथारिटी के हवाई अड्डों को बेहतर प्रबंधन के नाम पर निजी कंपनियों के हवाले करना न तो जनता और न ही कर्मचारियों के हित में हो सकता है। वैसे भी कोलकाता व चेन्नई एयरपोर्ट पर अथारिटी के 4००० कर्मचारी तैनात हैं। उनका क्या होगा?
सरकार अपनी योजनाओं का भार जनता पर न डाले
जिसका डर था, वही होने लगा है। केंद्र सरकार ने अपनी योजनाओं के लिए जनता पर भार डालना शुरू कर दिया है। सरकार अपनी योजनाओं के अभियानों के लिये कोष जुटाने हेतु दूरसंचार सेवाओं पर उपकर लगाने पर विचार कर रही है। अगर ऐसा हुआ तो फोन और इंटरनेट के बिलों में बढ़ोतरी हो सकती है। यह देशहित में नहीं है और मैं इस पर आपत्ति जताता हूं। सरकार अगर अपनी योजनाओं को लेकर काम कर रही है तो इसका असर जनता की जेब पर क्यों पड़े। इंटरनेट यूज करने वालों में अधिकतर छात्र हैं जो रोजमर्रा के पाठ्यक्रम के लिए भी इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। अगर इंटरनेट के बिल पर असर पड़ेगा तो एक छात्र इसका वहन कैसे कर पाएगा। केंद्र सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और ऐसे किसी प्रस्ताव को क्रियान्वयन में लाने से पहले मंथन करना चाहिए।
Saturday, 17 January 2015
पेट्रोल की कीमत पर जनता के साथ धोखा बर्दाश्त नहीं
अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में जिस तरह कच्चा तेल प्रति बैरल कम होता जा रहा है, उस हिसाब से सरकार ने पेट्रोल की कीमत को कम नहीं किया है. केंद्र सरकार को अभी जनता को राहत देनी थी, जो मुमकिन था, लेकिन सरकार ने उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी कर जनता को इस लाभ से महरूम कर दिया. अगर सरकार ऐसा नहीं करती तो पेट्रोल की कीमत साढ़े चार रुपये तक और डीजल की कीमत सवा चार रुपये तक सस्ती होती. ऐसा पहली बार नहीं है जब सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ाया हो. केवल इस एनडीए सरकार के इस बार सत्ता में आने के बाद से, नवम्बर 2014 से अब तक के दौरान चार बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया जा चुका है.
Friday, 16 January 2015
सेंसर बोर्ड प्रकरण की हो जाँच !
सेंसर बोर्ड की चेयरपर्सन का मुद्दा हमारे सामने आया है। यह इस बात
को दर्शाता है कि सेंसर बोर्ड की किस तरह से अनदेखी हो रही है। विवादस्पद फिल्म
मैसेंजर ऑफ़ गॉड को फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण ने हरी झंडी दे दी जिसकी मैं
घोर निंदा करता हूँ क्यूंकि जब 'सेंसर बोर्ड एक आजाद संस्था है और जब उसने इसकी इजाजत नहीं दी थी तो
ऐसा करना कतई जायज नहीं माना जा सकता क्यूंकि इससे न सिर्फ सेंसर बोर्ड कि
स्वाधीनता पर सवाल खड़ा होता है बल्कि इस तरह कि फिल्मों से देश में हालात
बिगड़ते हैं। सेंसर बोर्ड प्रमुख ने जिस तरह से इसपर नाराजगी जताई है वह जायज है और
मैं उनके द्वारा लिए गए स्तीफे के फैसले का स्वागत करता हूँ. डेरा सच्चा सौदा
प्रमुख बाबा राम रहीम की फिल्म ‘द मैसेंजर ऑफ गॉड' के रिलीज
को लेकर केंद्र द्वारा दबाव बनाए जाने का मैं पुरजोर विरोध करता हूँ क्यूंकि जिस
तरह से शुक्रवार को सेंसर बोर्ड की एक अन्य सदस्य इरा भास्कर ने भी इस्तीफा दिया
वह दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार को यह समझना चाहिए कि फिल्म के प्रदर्शन को लेकर जब
पंजाब और हरियाणा में प्रदर्शन भी हुए तो ऐसे फिल्म को हरी झंडी कैसे दी जा सकती
है? जब सैमसन ने कहा था कि सेंसर बोर्ड की ओर से लिखित तौर पर इस फिल्म
को रिलीज करने की अनुमति अभी तक नहीं दी गई है तो फिर ऐसे फिल्म को कैसे रिलीज़
करने की अनुमति दी गयी। साथ ही साथ लीला सैमसन द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप
कि भी जांच होनी चाहिए। इसके अलावा आम तौर पर जब ट्रिब्यूनल 15 से 30 दिन में फिल्म की रिलीज पर फैसला लेता है तो ऐसे में 'मैसेंजर ऑफ गॉड' को 24 घंटे में कैसे अनुमति मिल गई इसकी भी जांच होनी चाहिए।
Thursday, 15 January 2015
निराश्रितों के लिए क्यों नहीं कुछ कर रही सरकार?
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा
बार-बार रैनबसेरों की स्थिति को सुविधाजनक बनाने के निर्देश के बाद भी सरकार
द्वारा वो पहल नहीं हुई, जिसकी गुंजाइश मुमकिन थी। दिल्ली अरबन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड ने
हाल में कहा है कि कई लोग हैं जो निराश्रित और गृहविहिन हैं, लेकिन रैनबसेरों में नहीं
रहते हैं। दुखद पहलू ये है कि ऐसे भटक रहे लोग नशे के शिकार हो रहे हैं। आंकड़े पर
गौर करें तो गृहविहिन लोगों में 4० फीसदी लोग आज नशे की लत में फंस चुके हैं। यही नहीं, झुग्गियों में रहने वाले
भी अधिकांश लोगों को नशे के जंजाल में फंसते देखा गया है। नशे से देश को अगर मुक्त
करना है तो जागरुकता कार्यक्रमों को आयोजित करवाना होगा। ऐसे गृहविहिन लोगों की
पहचान करनी होगी और उन्हें इससे बाहर निकलने की प्रेरणा दी जानी चाहिए, अगर इस पर अविलंब अमल नहीं
हुआ तो नशे की जद में और भी लोग पड़ते चले जाएंगे।
Wednesday, 14 January 2015
केंद्र सरकार पहले इस देश की शिक्षा व्यवस्था को सुधारे
यह काफी दुखद है कि आज देश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट बताती है कि छह वर्ष से 14 वर्ष तक की शिक्षा का हाल देश में चिंताजनक है। सर्वे के मुताबिक, कक्षा आठ में पढ़ने वाले 25 फीसदी बच्चे कक्षा दो की टेक्स्ट बुक को पढ़ने में आज असमर्थ हैं। 2०14 के आखिर तक कक्षा पांच में पढ़ने वाले केवल 48.1 फीसदी बच्चे ही क्लास दो की टेक्स्ट पुस्तक को पढ़ पाने में समर्थ हुए। यह अपने आप में बताने के लिए काफी है कि देश में शिक्षा व्यवस्था का क्या हाल है। केंद्र सरकार को चाहिए कि अविलंब इस पर गौर करे। बच्चे इस देश के भविष्य हैं, अगर बुनियाद ही खराब होगी तो हमारे देश का भविष्य कभी उज्जवल नहीं हो सकता। केवल बातों से अच्छे दिन नहीं आएंगे, अच्छे दिन लाने के लिए धरातल पर काम करने चाहिए।
Tuesday, 13 January 2015
Monday, 12 January 2015
Saturday, 10 January 2015
जनता पर महंगाई की मार: अब टीवी, फ्रिज और ए.सी आदि महंगे हुए
आज देश में कंपनियां मनमानी पर उतारू हैं। इसी मनमानी का नतीजा है कि कई कंज्यूमर ड्यूरेबल्स कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स के दाम 5 फीसदी तक बढ़ा दिए हैं। अब टीवी, फ्रिज या फिर ए.सी खरीदने से पहले जनता को सोचना पड़ेगा। यह सरासर गलत और निंदनीय है। इन कंपनियों ने एक्साइज ड्यूटी और उत्पादन लागत में बढ़ोतरी का जो हवाला देते हुए कीमतों में वृद्धि की है, उस पर सरकार को पहल करनी चाहिए। एक्साइज ड्यूटी और उत्पादन लागत में बढ़ोतरी का बोझ उपभोगताओं पर क्यों पड़े? इस बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण था कि सरकार ने एक्साइज ड्यूटी पर मिल रही छूट को आगे बढ़ाने से इनकार किया, जिसके बाद कंपनियों ने ऐसा फैसला लिया है। कमज़ोर रुपए का होना भी इसका बड़ा कारण है। लेकिन मेरा एक ही मानना है कि किसी भी सूरत में जनता पर कोई बोझ नहीं पड़ना चाहिए। सरकार को चाहिए कि अविलंब इस पर पहल करे और ऐसी मनमानी पर अंकुश लगाए।
मुझे एक और बात भी पता लगी है कि जैसे कोई उपभोगता एक नया मोबाइल फ़ोन इंस्ट्रूमेंट खरीदता है 13,000 रूपए में उसी इंस्ट्रूमेंट को वही कंपनी एक दिन के बाद 7,000 या 8,000 रूपए में बेचती है। मेरा मानना है कि फ़ास्ट कंज्यूमर गुड्स के ऊपर भी सरकार का नियंत्रण होना चाहिए जिससे कि उपभोगता खुद को लुटा हुआ महसूस न करें और ये सुनिश्चित किया जाये कि उनके साथ कभी भी गुड्स और प्रोडक्ट्स के मामले में किसी प्रकार की धांधली नहीं हो। इसी प्रकार मैं ये भी मानता हूँ कि देश में युवाओं को इन्टरनेट की सुविधा उचित दरों पर मिलनी चाहिए क्योंकि आज देश के युवा इन्टरनेट पर काफी निर्भर हैं.
Friday, 9 January 2015
केंद्र की योजना जनता पर पड़ सकती है भारी
मुझे इस बात का डर है कि केंद्र की योजना कहीं जनता पर भारी न पड़ जाए। उद्योग संघ पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एवं उद्योग और क्रिसिल रेटिग ने एक शोध-पत्र जारी किया है। कहा गया है कि 'मेक इन इंडिया' परियोजना को बढ़ावा देने और 7-8 फीसदी विकास दर हासिल करने के लिए आने वाले पांच सालों के दौरान भारत को अपनी सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में 26 हजार अरब रुपये की आवश्यकता होगी।
यह इसलिए है क्योंकि आज भी देश की गरीब जनता अपनी मूलभूत समस्याओं से जूझ रही है। गांवों के इस देश में गरीब जनता के लिए सबसे पहले भोजन, वस्त्र और आवास की व्यवस्था की जानी चाहिए। यहां देश परेशानियों से जूझ रहा है और इस सरकार के नुमाइंदे हजारों-अरबों रुपए को शहरीकरण जैसी योजनाओं पर खर्च करने की बात कर रहे हैं, यह ठीक नहीं है। शहरीकरण भी जरूरी है, वो तब है जब देश की आम जनता को मुलभुत सुविधाएं मुहय्या हों। सरकार जिस भी योजना को लाए, लेकिन जनता पर इसका बोझ कतई नहीं पड़ना चाहिए।
यह इसलिए है क्योंकि आज भी देश की गरीब जनता अपनी मूलभूत समस्याओं से जूझ रही है। गांवों के इस देश में गरीब जनता के लिए सबसे पहले भोजन, वस्त्र और आवास की व्यवस्था की जानी चाहिए। यहां देश परेशानियों से जूझ रहा है और इस सरकार के नुमाइंदे हजारों-अरबों रुपए को शहरीकरण जैसी योजनाओं पर खर्च करने की बात कर रहे हैं, यह ठीक नहीं है। शहरीकरण भी जरूरी है, वो तब है जब देश की आम जनता को मुलभुत सुविधाएं मुहय्या हों। सरकार जिस भी योजना को लाए, लेकिन जनता पर इसका बोझ कतई नहीं पड़ना चाहिए।
बेरोजगारी दर बढ़कर 4.9 प्रतिशत
युवाओं की हमें अब इस बात को लेकर गहरी चिंता हो रही है कि हमारे युवा साथियों को रोज़गार का अवसर नहीं मिल पा रहा है। 2०14 लोकसभा चुनाव के दौरान इसी भाजपा ने 2 करोड़ हाथो को रोजगार देने का वादा किया था, लेकिन आज इसी भाजपा सरकार ने स्वीकार कर लिया है कि देश में बेरोज़गारी दर बढ़ गई है। श्रम मंत्रालय ने भारत में बेरोजगारी की दर का अध्ययन किया है। मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष में बेरोजगारी की दर बढ़कर 4.9 प्रतिशत पहुंच गई है। श्रम मंत्रालय की इकाई श्रम ब्यूरो द्वारा जारी ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते वित्त वर्ष में अखिल भारतीय स्तर पर बेरोज़गारी की दर बढ़कर 4.9 प्रतिशत पर पहुंच गयी है जो 2०12-13 में 4.7 प्रतिशत थी। पुरुषों में बेरोजगारी की दर 2०13-14 में बढ़कर 4.1 प्रतिशत पहुंच गयी जो 2०12-13 में 4 प्रतिशत थी। वहीं महिलाओं में बेरोजगारी की दर बढकर 7.7 प्रतिशत पहुंच गयी जो 2०12-13 में 7.2 प्रतिशत थी।
ये आंकड़े अपने आप में बताने के लिए काफी है कि भाजपा ने चुनाव के दरम्यान जितने वादे किए थे, उसे पूरा कर पाने में यह सरकार पूरी तरह से विफल रही है।
Thursday, 8 January 2015
जमीनी हकीकत से नावाकिफ है सरकार
देश में `मेक इन इंडिया' कैसे होगा साकार, जब सरकार को जमीनी स्तर का पता ही नहीं है? केवल बातों में `मेक इन इंडिया’ का गीत गाने से क्या होगा। क्या सरकार ने कभी यह जानने की कोशिश की कि मैनुफैक्चरिग सेक्टर्स की हालत आज क्या हो गई है। विश्व की थर्ड लारजेस्ट पीसी मेकर कंपनी 'डेल’ देश में मैनुफैक्टरिग क्षमता को लेकर संघर्ष के दौर से गुजर रही है। यही नहीं, 'एसर’ भी व्यापार का अनुकूल माहौल न होने की वजह से आज देश में इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ड्स का विस्तार करने से हिचक रही है। केवल यही नहीं हैं। देश में ऐसी हज़ारों कंपनियां हैं जो आज आखिरी सांस गिन रही हैं। `मेक इन इंडिया' का केवल प्रचार करने से पहले सरकार को इन पर भी तो सोचना चाहिए था। यह भी हकीकत है कि खराब नीतियों के कारण जीडीपी का वो ग्रोथ नहीं हो रहा है, जो सरकार ने वादे किए थे। पिछले वर्ष सरकार के चार माह पूरा करने के बावजूद फैक्ट्री का उत्पादन .1 फीसदी रहा, जो पहले 3.5 फीसदी हुआ करता था।
भारत में मैनुफैक्चरिग की राह में सबसे बड़ी समस्या है- बिजली की किल्लत और इसकी अधिक कीमत का होना। इसके आर्थिक मामलों में जहां अन्य देशों में 2-4 फीसदी ब्याज है, वहीं हमारे देश में यह 15 फीसदी है। इन परेशानियों के कारण भारत में मैनुफैक्चरिग 2० फीसदी हमेशा से कम होता रहा है। सरकार को चाहिए कि इस पर ध्यान दें और `मेक इन इंडिया' का ढोल पीटने से पहले यहां की समस्याओं पर गौर करें।
किसानों की सुध नहीं ले रही सरकार
2014 लोक सभा चुनाव के दौरान किसानों से जितने वादे किए गए थे, वो आज हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। काला धन लाकर हर गरीब और किसान के खाते में 15- 20 लाख रूपए डालने का वादा करने वाली इस सरकार के पास अब कोई जवाब नहीं है । हालात यह हैं कि इस बीजेपी सरकार के राज में किसानों को आज खाद तक मुहैय्या नहीं करायी जा रही है। कई किसानों से शिकायत आई है कि जहां प्रति एकड़ ज़मीन के लिए 2 बोरी यूरिया की जरूरत है, वहां 10 एकड़ पर भी दो बोरी मिलना नदारद हो गया है । अखबारों में हर दिन रिपोर्ट छपती है कि इन मसलों में कालाबाजारी की समस्याएं आ रही हैं। दलालों का बोलबारला हो रहा है, लेकिन सरकार इनकी सुध लेने को तैयार नहीं है। धान का मूल्य जो किसानों को पिछले साल 4200 रूपए प्रति क्विंटल मिला था आज उन्हें सिर्फ 1700 रूपए क्विंटल ही मिल पा रहा है. इस नुक्सान की भरपाई पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है. सरकार का ध्यान तो बस बड़े-बड़े पूंजीपतियों पर ही केन्द्रित है। हाल ही में सरकार को जब गेहूं के समर्थन मूल्य को दोगुना करना था, तो उसे केवल 50 रुपए ही बढ़ाया गया, जिसकी आलोचना देशभर के किसानों ने की। इस कृषि प्रधान देश में किसानों की अनदेखी का मतलब है- राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का चौपट हो जाना। अगर इसी तरह किसानों की अनदेखी होती रही तो हम इसके लिए भी आंदोलन करने से पीछे नहीं हटेंगे।
Wednesday, 7 January 2015
सरकार का रवैया प्रजातंत्र के लिए घातक
आज (7 जनवरी 2०15) मैंने अपने आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया, उस कॉन्फ्रेंस में मैंने सरकार के रवैये पर अपनी राय व्यक्त की।
मुझे इस बात से काफी अफ़सोस है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश जिस पर हम सभी को गर्व है, उस लोकतंत्र पर आघात करने के लिए ये सरकार आमादा है. जब से यह सरकार सत्ता में आई है, ऐसा लगता है कि वो यही सोचकर सत्ता में आई थी की इन्हें विपक्षी दलों के विचारों को दरकिनार करते हुए एक दलीय सरकार को ही चलाना है. सरकार ने संसद की संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए अध्यादेश को पारित करने की राह को चुना है. हमें आज भी याद है, यू पी ए के शासनकाल में यही भाजपा थी जो ये बार बार कहती थी की इमरजेंसी के वक़्त ही देशहित में अध्यादेश पारित होना चाहिए. वहीँ आज के हालात पर गौर करें तो यही भाजपा अपने वक्तात्यों से पलटते हुए संसद के आखिरी सत्र के एक दिन बाद ही अध्यादेश को जारी किया और संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया. अगर सही से याद करें तो ऐसा संसद के इतिहास में कभी नहीं हुआ था कि सत्र के स्थगित होने के बाद अध्यादेशों की एक कड़ी पारित हुई हो. हमने ऐसा इमरजेंसी के दौरान ही देखा था जब लगातार अध्यादेश जारी किये गए थे. कोई भी यह समझ सकता है कि संसद सत्र जब ना चल रहा हो, उस वक़्त अध्यादेश समझ में तो आता है, लेकिन अगर चुनी हुई सरकार लगातार अध्यादेश जारी करने की राह अपनाये तो यह प्रजातंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है. यह इस बात को दर्शाता है की सरकार इतने गंभीर कानूनों पर बहस कर पाने में असमर्थ थी. एक सरकार के दृष्टिकोण से यह सही नहीं है कि यदि उसके पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो वो बहस के अनुकूल मंच को दरकिनार करते हुए अध्यादेश जारी करें. हमारे प्रजातंत्र में ये कदापि मान्य नहीं है. इस मौजूदा सरकार ने इतने कम समय में 8 टुकडों में अस्थायी कानूनों पर जोर दिया है जिनमें से सबसे विवादस्पद हैं- कोल, भूमि अधिग्रहण, बिमा और हाल ही में खनिज.आम आदमी इस बात को अब कहने लगा है कि यह सरकार सिर्फ व्यापारी समुदाय को सन्देश दे रही है कि सरकार की सहानुभुति सिर्फ इन्हीं तक निहित है, क्योंकि अभी तक इस देश के गरीब और आम आदमी तक कोई फायदा नहीं पहुँचा है. लोग यह समझ चुके हैं कि अध्यादेश के जरिये इतने सारे बिल पास करने से संसदीय गतिविधि में अवरोध उत्पन्न होता है जहाँ बिल के गुण और दोष को लेकर संसद के पटल पर बहस होती है.मैं यूनियन ऑफ कोल इंडिया लिमिटेड के कर्मचारियों का स्वागत करता हूँ कि उन्होंने जो निजी कंपनियों को कोयले की नीलामी पर अध्यादेश जारी किया गया था, उसके खिलाफ आवाज उठायी. उन्होंने 5 दिन के बंद की घोषणा की, मुझे इस बात का डर है कि यदि उनकी मांगों को पूरा नहीं किया गया तो देश को बिजली की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. मेरे विचार से हमारे देश के पी.एस.यू कोल इंडिया के पास किसी भी निजी कंपनियों की तुलना में बेहतर विशेषज्ञ हैं. वैसे भी जो लोग निजी कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत हैं, वे सभी पी.एस.यू के ही सेवा निवृत्त पदाधिकारी हैं, चाहे वो कोल इंडिया से हों या ए.न.टी.पी.सी से. यह बताते हुए सुखद अनुभूति होती है कि कोल इंडिया ने अपनी पैदावार क्षमाता को दो गुना करते हुए 21० मिलियन टन जो 1992-93 में था वो अब 462 मिलियन टन हो चुका है, जबकि निजी कंपनियां जिन्हें कोल ब्लॉक आवंटित किये गए थे, वह सिर्फ 46 मिलियन टन ही कोयला पैदा कर सके. लोगों में यह गलत धारणा है कि कोयले की कमी भारत में कोल इंडिया की वजह से है, यह सरासर गलत है. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा कि इस सरकार को क्या हो गया है कि वह सिर्फ बड़े कॉरपोरेट घरानों को ही खुश करने में लगी है.पी.एस.यू के कर्मचारी और आम लोग यह कहने लगे हैं कि सरकार हड़बड़ी में अस्थायी कानून ला रही है प्रधानमन्त्री जब से विभिन्न देशों का दौरा करके आएं हैं जहाँ उन्होंने व्यावसायिक समुदायों से बड़े बड़े वादे किये. मुझे नहीं लगता की व्यावसायिक समुदायों का मनोबल बढ़ेगा जिस तरह से अध्यादेश पारित किये जा रहे हैं. जहाँ एक तरफ सरकार प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को खत्म कर रही है वहीँ दूसरी तरफ सरकार अपने लक्ष्य को पाने में असफल साबित हुई.
मुझे इस बात से काफी अफ़सोस है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश जिस पर हम सभी को गर्व है, उस लोकतंत्र पर आघात करने के लिए ये सरकार आमादा है. जब से यह सरकार सत्ता में आई है, ऐसा लगता है कि वो यही सोचकर सत्ता में आई थी की इन्हें विपक्षी दलों के विचारों को दरकिनार करते हुए एक दलीय सरकार को ही चलाना है. सरकार ने संसद की संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए अध्यादेश को पारित करने की राह को चुना है. हमें आज भी याद है, यू पी ए के शासनकाल में यही भाजपा थी जो ये बार बार कहती थी की इमरजेंसी के वक़्त ही देशहित में अध्यादेश पारित होना चाहिए. वहीँ आज के हालात पर गौर करें तो यही भाजपा अपने वक्तात्यों से पलटते हुए संसद के आखिरी सत्र के एक दिन बाद ही अध्यादेश को जारी किया और संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया. अगर सही से याद करें तो ऐसा संसद के इतिहास में कभी नहीं हुआ था कि सत्र के स्थगित होने के बाद अध्यादेशों की एक कड़ी पारित हुई हो. हमने ऐसा इमरजेंसी के दौरान ही देखा था जब लगातार अध्यादेश जारी किये गए थे. कोई भी यह समझ सकता है कि संसद सत्र जब ना चल रहा हो, उस वक़्त अध्यादेश समझ में तो आता है, लेकिन अगर चुनी हुई सरकार लगातार अध्यादेश जारी करने की राह अपनाये तो यह प्रजातंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है. यह इस बात को दर्शाता है की सरकार इतने गंभीर कानूनों पर बहस कर पाने में असमर्थ थी. एक सरकार के दृष्टिकोण से यह सही नहीं है कि यदि उसके पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो वो बहस के अनुकूल मंच को दरकिनार करते हुए अध्यादेश जारी करें. हमारे प्रजातंत्र में ये कदापि मान्य नहीं है. इस मौजूदा सरकार ने इतने कम समय में 8 टुकडों में अस्थायी कानूनों पर जोर दिया है जिनमें से सबसे विवादस्पद हैं- कोल, भूमि अधिग्रहण, बिमा और हाल ही में खनिज.आम आदमी इस बात को अब कहने लगा है कि यह सरकार सिर्फ व्यापारी समुदाय को सन्देश दे रही है कि सरकार की सहानुभुति सिर्फ इन्हीं तक निहित है, क्योंकि अभी तक इस देश के गरीब और आम आदमी तक कोई फायदा नहीं पहुँचा है. लोग यह समझ चुके हैं कि अध्यादेश के जरिये इतने सारे बिल पास करने से संसदीय गतिविधि में अवरोध उत्पन्न होता है जहाँ बिल के गुण और दोष को लेकर संसद के पटल पर बहस होती है.मैं यूनियन ऑफ कोल इंडिया लिमिटेड के कर्मचारियों का स्वागत करता हूँ कि उन्होंने जो निजी कंपनियों को कोयले की नीलामी पर अध्यादेश जारी किया गया था, उसके खिलाफ आवाज उठायी. उन्होंने 5 दिन के बंद की घोषणा की, मुझे इस बात का डर है कि यदि उनकी मांगों को पूरा नहीं किया गया तो देश को बिजली की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. मेरे विचार से हमारे देश के पी.एस.यू कोल इंडिया के पास किसी भी निजी कंपनियों की तुलना में बेहतर विशेषज्ञ हैं. वैसे भी जो लोग निजी कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत हैं, वे सभी पी.एस.यू के ही सेवा निवृत्त पदाधिकारी हैं, चाहे वो कोल इंडिया से हों या ए.न.टी.पी.सी से. यह बताते हुए सुखद अनुभूति होती है कि कोल इंडिया ने अपनी पैदावार क्षमाता को दो गुना करते हुए 21० मिलियन टन जो 1992-93 में था वो अब 462 मिलियन टन हो चुका है, जबकि निजी कंपनियां जिन्हें कोल ब्लॉक आवंटित किये गए थे, वह सिर्फ 46 मिलियन टन ही कोयला पैदा कर सके. लोगों में यह गलत धारणा है कि कोयले की कमी भारत में कोल इंडिया की वजह से है, यह सरासर गलत है. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा कि इस सरकार को क्या हो गया है कि वह सिर्फ बड़े कॉरपोरेट घरानों को ही खुश करने में लगी है.पी.एस.यू के कर्मचारी और आम लोग यह कहने लगे हैं कि सरकार हड़बड़ी में अस्थायी कानून ला रही है प्रधानमन्त्री जब से विभिन्न देशों का दौरा करके आएं हैं जहाँ उन्होंने व्यावसायिक समुदायों से बड़े बड़े वादे किये. मुझे नहीं लगता की व्यावसायिक समुदायों का मनोबल बढ़ेगा जिस तरह से अध्यादेश पारित किये जा रहे हैं. जहाँ एक तरफ सरकार प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को खत्म कर रही है वहीँ दूसरी तरफ सरकार अपने लक्ष्य को पाने में असफल साबित हुई.
Tuesday, 6 January 2015
अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखे केंद्र
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए नीतियां अहम होती हैं। फिलहाल अर्थव्यवस्था को लेकर जिस तरह के कदम उठने चाहिए थे, उस पर सरकार का गंभीर रवैया नहीं दिख रहा है। सरकार का ये उदासीन रवैया उस वक्त है जब शेयर बाजार में हाहाकार मचा हुआ है। सरकार को सबसे पहले अपनी कृषि पर ध्यान देना होगा। भारत एक कृषि प्रधान देश है, हम उसी को छोड़ कर दूसरी तरफ लग गए हैं। विनिर्माण क्षेत्र की तरफ भी ध्यान देने कि ज़रूरत है। मैं आर्थिक सुधारों के खिलाफ नहीं हूँ, मगर हमको पहले अपने भीतर की ताकत को मजबूत बनाना होगा जैसा कि चीन ने किया हुआ है। चीन सिर्फ विदेशी पूंजी पर ही निर्भर नहीं है। मगर हम तो दिन प्रतिदिन अपने आप को विदेशी पूंजी पर ही निर्भर करते जा रहे हैं। सरकार को इस सन्दर्भ में दिशा परिवर्तन करना चाहिए।
क्या 'योजना’ में भरोसा नहीं रहा सरकार को ?
आखिर 'नीति आयोग’ ही क्यों? वर्ष 195० में बने 'योजना आयोग’ को एक झटके में खत्म करने का क्या मतलब है ? क्या केंद्र सरकार को 'योजना’ पर भरोसा नहीं था, या इस देश को कॉरपोरेट्स के हाथों में सौंपने की बहुत बड़ी साजिश हो रही है? ये कई सवाल हैं जिसका जवाब देश आज जानना चाहता है। सरकार को अगर इसमें परिवर्तन ही लाना था तो 'योजना आयोग’के अंतर्गत ही नीतियों, दिशा-निर्देशों में परिवर्तन लाकर भी उसे कार्यान्वित किया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसा डर है कि 'नीति आयोग’ के पीछे नीति बनाने में कॉर्पोरेट्स की ही चलेगी। योजना आयोग में राज्य सरकारों से विचार विमर्श होता था जो एक सही प्रयोग था क्योंकि चर्चा से ही सही रस्ते निकलते हैं। संघीय संरचना को मजबूत रखने के लिए मैं समझता हूँ कि योजना आयोग में बदलाव करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। अभी केवल राज्यों को वित्त मंत्रालय के अनुसार ही चलना होगा और इसके साथ-साथ चर्चा का मंच भी ख़त्म हो जायेगा जो प्रजातंत्र के लिए ठीक नहीं होगा।
Monday, 5 January 2015
फर्जी वोटरों की जांच होने के बाद ही हो चुनाव
दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले फर्जी वोटरों का मामला कई न्यूज़ चैनल्स दिखा रहे हैं, यह काफी दुखद और आपत्तिजनक है। न्यूज चैनलों के खुलासों में बताया गया है कि वोटरों के पते और नाम तो अलग हैं, लेकिन चेहरा एक है। असल में कुछ राजनीतिक दल वोट बटोरने के लिए वोटर लिस्ट में धांधली करने की योजना बना रहे हैं।
पैसों की आड़ में इस तरह का फर्जी खेल लोकतंत्र के लिए विष के बराबर है, जहां घूसखोरी से लेकर तमाम गोरखधंधों को अंजाम दिया जाता है। चुनाव आयोग समेत सरकार से गुजारिश है कि ऐसे मामलों की निष्पक्षता से जांच हो और जांच पूरी होने के बाद ही दिल्ली में चुनाव हो। यह भारतीय राजनीति और प्रजातंत्र के साथ घिनौना मजाक है। ऐसे कृत्यों में शामिल अधिकारियों को भी कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए, क्योंकि ऐसे में तो जनता का लोकतंत्र से भरोसा ही उठ जाएगा।
Sunday, 4 January 2015
देश की अर्थव्यवस्था पर किसी का ध्यान नहीं
यह हमारे देश के साथ दुर्भाग्य और युवाओं के अन्याय ही कहा जाएगा क्योंकि देश का लाखों-करोड़ों रुपए पूंजीपतियों की जेब में जा रहा है और जनता एक-एक रुपए जोड़ने के लिए दिन-रात मेहनत में जुटी है। एक रिपोर्ट काफी चौंकाने वाली है। रिपोर्ट की मानें तो बैंकिंग सेक्टर जिस रियल इस्टेट को चमकाने के लिए अब तक लगे हुए थे, इसका खामियाजा बड़े पैमाने पर आज देश भुगत रहा है। रियल इस्सेट में पूंजीपतियों पर बढ़ती हुई गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) के कारण यह आज अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बन चुकी है, जिस पर सरकार का कोई ध्यान ही नहीं है। रियल इस्टेट की आड़ में बैंकों से पूंजी लेकर उसका दुरुपयोग जहां दो-तीन वर्ष पहले थोड़ा कम हुआ करता था, वह आज लगभग डेढ़ गुने से भी कहीं अधिक हो चुका है। 2०11-12 के दौरान एनपीए का आंकड़ा जहां 1०.8 फीसदी था, वह आज 2०13-14 के दौरान बढ़कर 18.6 फीसदी हो चुका है। यह केंद्र सरकार की लापरवाही का ही नतीजा है कि पांच वर्ष पहले जहां एक ओर बैंक इन रियल इस्टेट पर 5.8 लाख करोड़ का निवेश कर चुकी थी, वहीं आज यह सीधा दोगुना, यानी 1०.94 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है।
सवाल है कि एक तरफ केंद्र सरकार देश में काला धन लाने की बातें करती है। वह भी केवल बातों में ही रह जाता है। मुद्दे भटका दिए जाते हैं। वहीं दूसरी ओर, देश का इतना पैसा अगर पूंजीपतियों की हाथों में होगा तो देश में निम्न और मध्यम वर्गों का विकास कैसे संभव है? यह सोचने वाली है। क्या केंद्र सरकार के नुमाइंदों को नहीं पता कि लाखों लोग आज भी भूखे पेट सोते हैं? क्या देश के शीर्षस्थ को यह नहीं पता कि इस चौपट होती अर्थव्यवस्था से देश विनाश के रास्ते चल पड़ा है, जहां अमीर अधिक अमीर होते जा रहे हैं और गरीब अधिक गरीब हो रहे हैं। पता होता तो सरकार इसे गंभीरता से लेती, मगर ऐसा नहीं है।
यह देश के युवाओं के साथ अन्याय है। क्योंकि यह युवाओं का देश है। हिन्दुस्तान में करीब 7० फीसदी आबादी युवाओं की है। देश के युवा एक तरफ तो रोजी-रोटी की तलाश में दिनभर धक्के खा रहे हैं, वहीं केंद्र सरकार के इन लापरवाह रवैये के कारण लाखों करोड़ रुपए को पूंजीपतियों की जेब में डाल दिया जा रहा है। देश के युवाओं को इस मामले के खिलाफ आगे आना चाहिए, क्योंकि इस देश को युवा ही पटरी पर ला सकते हैं।
Friday, 2 January 2015
युवा लक्ष्य निर्धारित करें, आगे बढ़ें
सबसे पहले आप सभी युवा बंधुओं को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। यह देश युवाओं का देश है। युवाओं के बेहतर भविष्य को लेकर ही इस देश में बेहतरी की कल्पना की जा सकती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश को जिन्होंने नया आयाम दिया, देश-प्रेम के लिए इतिहास रचा, वो युवा ही थे। हर एक युवा पर देश को संवारने और सही दिशा पर ले जाने की जिम्मेदारी है। मित्रों, यह नए वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं। नया लक्ष्य बनाइए, उस लक्ष्य को पाने के लिए मेहनत कीजिए। जीत हमेशा आपकी होगी।
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